अंधी दौड़ (Blind Race)

अंधी दौड़

            बचपन में सभी कहते थे खूब पढ़ाई करो और सबसे बड़े पद तक पहुँचो, खूब मेहनत करो और सबसे कठिन परीक्षा पास कर आईएएस बनोI तब आईएएस बनने का मतलब अंतिम सम्पूर्णता होती थी मानो आईएएस बनते ही यह दुनिया सहसा मेरे लिए पुर्णतः बदल जाएगी, मेरे लिए दुनिया की हर ख़ुशी, हर इच्छा सहज उपलब्ध होगीI यदि आईएएस बन जाऊं तो सर्व शक्तिमान बन जाऊंगाI मैं, मैं न रहकर कुछ और हो जाऊंगाI हमारी कक्षा में या फिर हमारे मोहल्ले में जो स्टूडेंट सबसे ज्यादा तेज होता या फिर जब हम में से कोई भी उसके जितना शैक्षणिक रूप से सजग, सफल, गम्भीर न होते तो उस विशेष योग्यता वाले स्टूडेंट को आशान्वित नजरों से निहारकर स्कूल में हमारे शिक्षक और घर में हमारे अभिभावक हमलोगों को उलाहना देते हुए कहते–“ देख लेना तुम लोग, यह बच्चा एक दिन आईएएस बनेगा” और उन क्षणों में हम उस विशेष बच्चे को तरसती निगाहों से देखते हुए सोचते कि काश हम भी वैसा हो पाते, काश मैं भी आईएएस बन पाताI उन क्षणों में उससे ईर्ष्या  से ज्यादा खुद की कमी पर तरस आता और झुंझलाहट होताI

 इसका तात्कालिक असर यह होता कि हम अगले कुछ दिनों तक उस विशेष योग्यता वाले स्टूडेंट की नकल करने की कोशिश करते, जैसे वह क्लास में हम सभी से ज्यादा बात नहीं करता, हम भी नहीं करते, जैसे वह लंच ब्रेक के समय किताब ले कर बैठे रहता, हम भी बैठ जातेI शाम में उसे खेलने के बजाये अपने घर के छत पर घूम घूम कर, हाथ में किताब लेकर कुछ याद  करने की कोशिश करते देख कर कई दिनों तक हम भी वैसे ही छत पर घूम घूम कर पढ़तेI पर हम तो हम ही थे, यह नकल और उसकी तरह आईएएस बनने की सम्भावना के तरफ की दौड़ में हम जल्दी ही हांफ जातेI स्कुल से घर तक अपने स्वभाव से विपरीत अपनी तमाम इच्छाओं को मारने की प्रक्रिया दो-तीन दिन में ही ज्यादती लगने लगती और हम पूर्ववत अपने स्वभाव के अनुसार जीवन जीने लगतेI अपने बचपना, अल्हड़पन, उन्मुक्तता के बीच इस तरह का तरसता, ललचाता, कृत्रिम आवेग कई बार आया पर हर बार वह क्षणिक ही रहा, मैं जल्दी ही हर बार उससे मुक्त होता गया, न मैं उस जैसा जी पाया न उस जैसा बन पायाI

मुझे नहीं पता वह अब कहाँ और किस पद पर हैI किराये के मकान में रहने वालों की यही अद्भुत विशेषता होती है, वे जब जहाँ होते हैं वहाँ अपनी अमिट छाप छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैंI वे चले जाते हैं पर वह जगह, वातावरण, वहाँ के कई लोग हमेशा उनके स्मृति चिन्हों के सहारे उनके वर्तमान की कल्पना करते रहते हैंI मुझे नहीं पता कि वह छात्र आईएएस बना या नहीं, पर मैं तो नहीं ही बन पाया, मैं तो कभी बनने वाला था भी नहीं, और वह पद, उस पद से जुड़ी तमाम प्रतिष्ठित किवदंतियां मेरे लिये कभी यथार्थ न बन सकीI

वक्त के साथ सब कुछ धुंधला होता चला गया, वह छात्र और उससे जुड़ी तरसती यादें, आईएएस बनने के सपने से जुड़ीं मधुर कल्पनाएँ, आकर्षण, अपनी अक्षमता पर झुंझलाहट सब बीते कल की बात हो गईI पर पिछले दिनों जब एक आईएएस के आत्महत्या की दर्दनाक खबर सुनी तो सहसा बचपन की वो समस्त यादें पुनः ताजा हो गईI मैंने भले ही इस आईएएस में क्षण भर से ज्यादा अपने यादों में बसे उस छात्र को न ढूंढा हो पर  तकलीफ तो हरपल व्यक्तिगत ही बनता जा रहा हैI जैसे-जैसे इस आईएएस के आत्महत्या से सम्बन्धित खबरें विस्तृत रूप से आते जा रही हैं वैसे-वैसे मेरे भीतर की कड़वाहट बढती जा रही है और न जाने क्यों यह तकलीफ पहले से ज्यादा व्यक्तिगत होते जा रहा हैI चाहे वह सुसाइड नोट हो या आईएएस का मृत्यु पूर्व का पूरी दुनिया के समक्ष अपनी आत्महत्या का कारण बताने वाला वीडियो, सभी ने मेरे भीतर एक हलचल सी मचा रखी हैI

असमय मृत्यु चाहे वह किसी का भी हो दुखद ही होती है, दर्दनाक और ह्रदय विदारक ही होती है पर इस आईएएस की आत्महत्या से मेरे भीतर जो दुःख उमर रहा है वह सिर्फ एक सजीव के स्वयं इह लीला समाप्त कर लेने की पीड़ा तक सीमित नहीं है, यह तो उस से ज्यादा व्यापक और गहरा हैI दरअसल उसका इस तरह से कई दिनों तक योजना बना कर उसे अंजाम तक पहुँचाना तो मुझे विचलित कर ही रहा है, इसके साथ ही उसका आईएएस होना भी मेरे अंदर हलचल मचाये हुए हैI

मैं तो अब तक एक आईएएस होने का अर्थ सम्पूर्णता ही समझता था, आईएएस मतलब पूर्ण, सम्पूर्ण, पीड़ा रहित, दुःख रहित, समस्त सुख से पूर्ण, उच्चतम योग्यता, सौभाग्य, सफलता से अलंकृत जीवनI इस तरह के व्यक्ति का इस तरह से आत्महत्या करना मेरी अब तक की कई सारी मान्यताओं, धारणाओं को तहस-नहस कर रही हैI जो पूर्ण है, सर्वसम्पन्न है, उसका इस तरह पलायन और इस हद तक की कायरता वह भी इस अहसास के साथ, स्वीकारोक्ति के साथ कि ‘यह कायरता है’ मुझे अचम्भित किये हुए है, उद्वेलित किये हुए हैI मैं आईएएस बनना तो दूर उतनी योग्यता के करीब भी कभी पहुंच नहीं पाया पर मेरे मन में जीवन के कठिनतम और बुरे से बुरे दौर में भी आत्महत्या का तो ख्याल तक नहीं आया फिर उसके मन में यह कैसे आ सकता है! असम्भव!

मैं अचम्भित हूँ, स्तब्ध हूँ, इस आईएएस की आत्महत्या ने मुझे और मेरी कई सारी मान्यताओं को हिलाकर रख दिया हैI और काफी चिन्तन के बाद भी मैं संतुष्ट नहीं हूँ, लगता है जैसे कहीं कुछ गलत है, मैं उसके जीवन के साथ के गलत से ज्यादा खुद की कुछ मान्यताओं के गलत होने से चिंतित हूँI जब मेरे मन में कभी भी आत्महत्या जैसी कायरता का भूल से भी ख्याल तक नहीं आया तो एक आईएएस के मन में यह ख्याल भला कैसे आ सकता है? और यदि आ सकता है और यदि वह इस तरह पूर्व नियोजित तरीके से आत्महत्या कर सकता है फिर मैं अपने बचपन में आईएएस बनने के लिये प्रेरित क्यों था? फिर आईएएस बनने की सम्भावना दिखने भर से मैं किसी की  उलूल-जलूल नकल क्यों कर रहा था? जब कोई आईएएस भी इस तरह की हरकत कर सकता है, इस हद तक कमजोर हो सकता है फिर स्कुल से लेकर घर तक सभी आईएएस बनने के लिये ही प्रेरित क्यों करते थे? फिर आईएएस बनने में भला कौन सी और कैसी सम्पूर्णता है?

यह कैसी खोखली विशेषता है जिसके लिए तब भी और अब भी तमाम अभिभावक, शिक्षक अपने बच्चों को सिर्फ इसी के लिये प्रोत्साहित करते हैं? फिर सब यह सफेद झूठ क्यों बोलते हैं कि जीवन का सबसे कठिन परीक्षा आईएएस बनना है, सब क्यों और कैसे कहते हैं कि आईएएस बनने का मतलब है जीवन का सम्पूर्ण हो जाना? सब यह क्यों नहीं कहते हैं कि कि भले ही आईएएस की परीक्षा कैरियर सम्बन्धित सबसे कठिन परीक्षा है पर यह जीवन की परीक्षा नहीं हैI सब यह क्यों नहीं बताते हैं कि आईएएस बनने से ज्यादा महत्वपूर्ण खुद को मानसिक रूप से धैर्यवान, सबल,और इस हद तक मजबूत बनाना है कि जीवन की सम्भावित कठिनाइयों, परेशानियों के समक्ष हम सहज रह सकें, ये परेशानियाँ हमारी जिजीविषा को जरा भी प्रभावित न कर सकेI

उस आईएएस ने तो यह महान परीक्षा अपनी उच्चतम योग्यता, कैरियर के प्रति निरंतर निष्ठा और कड़ी मेहनत के बल पर उच्च श्रेणी के साथ पास कर ली थी, फिर वह जीवन की वास्तविक परीक्षा में ही कैसे असफल हो गया? मतलब स्पष्ट है कि हमारे शिक्षक, हमारे अभिभावक और भौतिक ऊँचाइयों की तरफ अंधी दौड़ लगाती यह सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था इस पूरी पीढ़ी के साथ न्याय नहीं कर रही हैI दिन-रात गलत शिक्षा देकर गलत लक्ष्य के प्रति इस पीढ़ी को प्रेरित कर उसे एक निरर्थक निष्कर्ष की तरफ धकेल रही हैI

 इस आईएएस की असमय मृत्यु के लिए यह सम्पूर्ण सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था भी दोषी है जो बच्चों के बचपन को उस अंधी दिशा में, अंधे लक्ष्य के तरफ धकेल रही है जिसका निष्कर्ष इसी तरह का पीड़ादायक व निरर्थक हैI जरा याद कर के देखिये कि आपके स्कुल में कितनी बार आपको आपके शिक्षक ने जीवन के संघर्षों के प्रति संवेदनशील,एक मजबूत, सुदृढ़ इन्सान बनने के लिए प्रेरित किया थाI जरा याद कर के देखिये कि फिजिक्स, कमेस्ट्री, बायोलॉजी, मैथ की अनगिनत क्लास के बीच क्या कभी जीवन की वास्तविक परीक्षा के लिये तैयार करने हेतु कोई क्लास हुआ थाI जरा याद करिये,आपके अपने मम्मी-पापा ने अपना कितना वक्त आपको इस बात के लिए तैयार करने में दिया है कि जीवन की इन वास्तविक परीक्षाओं को आपने कैसे पास करना हैI

जिस शहर में जाइये प्रतियोगिता परीक्षा के लिए हर गली, चौराहे पर अनगिनत कोचिंग संस्थान खुले हैं, क्लर्क, इंजीनियर बनने से डॉक्टर, आईएएस बनने तक के लिए, हर परीक्षा के लिए असंख्य कोचिंगI पर जीवन की वास्तविक परीक्षा के लिए क्या कभी आपने कोई कोचिंग देखी है? कोटा जो कोचिंग संस्थाओं का हब है, वह शहर ही कोचिंग संस्थानों के कारण आधुनिक रूप से विकसित हो गया और जहाँ हर समय किसी न किसी छात्र के आत्महत्या की खबर आती रहती है, क्या वहाँ कोई कोचिंग सिर्फ इस बात की शिक्षा देने के लिए है कि जीवन की वास्तविक परीक्षा यह प्रतियोगिता परीक्षा नहीं है? हमारे अभिभावक जितना पैसा व वक्त प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता हेतु खर्च कर देते हैं क्या इसका आधा भी वे अपने बच्चों को जीवन के वास्तविक संघर्षों के लिए तैयार करने के पीछे करते हैं?

जो वास्तविक है, जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है उसके प्रति इतनी और ऐसी उदासीनता क्यों? बच्चों को जिस तरह दिन रात आईएएस बनने या किसी अन्य भौतिक ऊंचाई के लिये प्रेरित किया जाता है, उसी तरह उसे एक अच्छा इन्सान बनने, जीवन की तमाम कठिनाइयों के समक्ष दृढ़ता से जूझने के लिए, मजबूत बनने के लिये प्रेरित क्यों नहीं किया जाता? जीवन है तभी तो कोई बड़ा पद, भौतिक ऊंचाई या सुख है, जीवन है तभी तो आईएएस है, फिर जीवन को सहज, सजग, सुंदर, सतत बनाने के प्रति इतनी उदासीनता कैसे और भला क्यों? जीवन रहेगा तभी तो आईएएस का स्टेट्स, समृधि, प्रभाव बचेगा, और इस जीवन का रहना तो पुर्णतः व्यक्तित्व निर्माण पर निर्भर है फिर इतने मूल विषय के प्रति इस हद तक की उदासीनता क्यों और कैसे?

मैं नहीं मानता कि इस आईएएस की आत्महत्या सिर्फ व्यक्तिगत हताशा, निराशा, जीवन की स्वभाविक या अस्वभाविक कठिनाइयों के प्रति अक्षमता से निष्कर्षित पलायन हैI मेरी समझ से यह तो एक तरह से परोक्ष हत्या है जो वर्तमान सामाजिक भौतिक व्यवस्था ने जाने-अनजाने में की हैI जीवन है तो कठिनाइयाँ आयेंगी ही, जीवन है तो अवसाद होंगे ही, जीवन है तो पीड़ा समय-असमय होगा ही, संघर्ष, तकलीफ तो अवश्यम्भावी है फिर हम हमारी पीढ़ी को इस निश्चित से परिस्थितियों के लिए क्यों नहीं तैयार करते हैं? हमारी सामाजिक व्यवस्था भौतिक ऊंचाईयों को महिमामंडित करती हुई क्यों है? व्यक्तित्व की ऊंचाई, शुद्धता, आंतरिक मजबूती,संघर्ष क्षमता, आचरण जैसे वास्तविक गुण सम्मान, प्रतिष्ठा का आधार क्यों नहीं है? भारत वर्ष जैसे नैतिक बल से हमेशा उर्वरा, पुरे विश्व को नैतिक शिक्षा व जीवन जीने की कला का ज्ञान देने वाली पवित्र भूमि में जन्म लेने वाले बच्चे जीवन की वास्तविक शिक्षा से वंचित क्यों हैं? और जब तक वे वंचित हैं तब तक इस तरह की असमय मृत्यु को मैं आत्महत्या नहीं मानूंगा, मेरे लिये तो यह एक निर्मम सामाजिक हत्या हैI

 

Comments (2)

  1. Bikash
    August 26, 2017 - 8:14 pm Reply

    Exactly… There is big gap in society knowledge and academic knowledge…. This is because lack of flow of custom and traditions thoughout our generation.

  2. August 19, 2018 - 10:33 am Reply

    बहुत ही वैचारिक और सच्चाई के करीब है आपका ये लेख !

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