परीक्षा (Examination)

परीक्षा

संवाद छात्र-छात्राओं से:-

    काफी समय से सोच रहा था कि आपसे संवाद करूं, अपने मन की बात को आप से साझा करुं। मुझे पता है कि आप सभी विभिन्न अकादमिक व प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कठिन मेहनत कर रहते हैं। वह सब कुछ कर रहे हैं जो आप कर सकते हैं। आपकी नजर दिन-रात परीक्षा की तारीख पर टिकी हुई रहती है। हर बितता दिन आपको आपके परीक्षा के और करीब कर रहा है। और आप जैसे-जैसे परीक्षा के तारीख के नजदीक पहुंच रहे हैं आपके अंतःकरण का दवाब बढ़ता जा रहा है। आपके उत्साह में कोई कमी नहीं है पर आप में से कई इस वजह से एक तरह का मानसिक दवाब महसूस कर रहे हैंI लेकिन यहीं पर समस्या है, वह समस्या जो आपकी क्षमता, आपके बेहतर सम्भावनाओं पर असर डाल रहा है, परीक्षा की नजदीक आती तारीख के साथ यह हो रहा हैI आप परीक्षा की तारीख की वजह से अनावश्यक रूप से खुद को अनुचित दवाब में ला रहे हैं और यह दवाब निश्चित रूप से आपकी क्षमता को क्षति पहुंचा रहा हैI

    इस बात को ठीक से समझाने के लिए आपको एक सरल उदाहरण देता हूँ। आप में से ज्यादातर लोगों नें किसी बड़े क्रिकेट टूर्नामेंट का फाइनल मैच टीवी पर लाइव अवश्य देखा होगा। क्रिकेट तो इस देश के लिए एक धर्म की तरह है, और इसके बड़े मैचों में हम महापर्व की तरह शरीक होते हैं, इसीलिए मैं आपलोगों के ऐसे मैच देखने को लेकर निश्चिन्त हूँI किसी भी बड़े टूर्नामेंट के फाइनल में चाहे वह वर्ल्ड कप का फाइनल हो या एशिया कप का फाइनल, कमेंटेटर, विश्लेषक जिन्हें आजकल एक्सपर्ट कहा जाता है एक बात अवश्य कहते हैं और हर बड़े मैच के पहले कहते हैं कि- “दोनों में से जो टीम या जिस भी टीम के सदस्य इस बड़े मैच का दवाब सफलतापूर्वक वहन कर लेंगे, सह लेंगे वह टीम ही जीतेगी”। ये शब्द मैंने हर बड़े मैच के पहले या मैच के दौरान बार-बार सुनी है, आपने भी सुना होगा। इसका अर्थ और संदेश इन शब्दों की तरह ही स्पष्ट है। किसी भी बड़े टूर्नामेंट में जिसमें विश्व की बेहतरीन टीम भाग ले रही हो और उसके फाइनल में जो भी दो टीमें पहुँचेगी निश्चित रूप से वह उस वक्त की बेहतरीन टीम ही होगीI दोनों की क्षमता में ज्यादा का फर्क नहीं होता है पर जीत तो एक ही टीम को मिलती है, और वह उस टीम को मिलती है जो उस बड़े मैच के लिए उत्पन्न स्वयं की और अपने देशवासियों की अपेक्षा से बने बड़े दवाब को सहजता से झेल ले, उस दवाब से अपनी क्षमता को प्रभावित न होने देI और यही बात बड़े खिलाड़ीयों पर भी लागू होती है। महेंद्र सिंह धोनी इतने बड़े खिलाडी इसीलिए बने क्योंकि इस तरह के दवाब को सहने की उनमे अद्भुत क्षमता है। तकनीकी रूप से वह सर्वश्रेष्ठ ख़िलाड़ी नहीं हैं पर उन्होंने खुद को और अपनी टीम को शिखर पर इसीलिए पहुँचाया क्योंकि वे उपरोक्त दवाब का सामना बेहतरीन तरीके से करते हैंI

    इससे यह बात तो स्पष्ट है कि स्वयं की या अन्य अपनों की अपेक्षाओं का मानसिक दवाब हर व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है और यह हमारी क्षमता को प्रभावित भी करता हैI तो यह दवाब आपकी क्षमता को नाकारात्मक रूप से प्रभावित न करे इसलिए यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि परीक्षा और उसकी नजदीक आती तारीख आपके लिए दवाब का विषय ही न होI

    मुझे एक बात बताइये, क्या यह सम्भव है कि कोई भी छात्र या छात्रा सिर्फ परीक्षा के एक दिन पूर्व या परीक्षा के दिन ही पढाई कर के बड़े प्रतियोगिता परीक्षा में सफल हो जाए, नहीं न! मतलब स्पष्ट है कि परीक्षा की तारीख और वह दिन आपके भविष्य का निर्माण नहीं करता हैI बिलकुल नहीं। सच पूछिये तो उस दिन का योगदान आपके तैयारी के अन्य सामान्य दिनों की तरह ही है। आपने जिस निष्ठा और निरतंरता से कड़ी मेहनत कर परीक्षा के पहले के तमाम दिनों में तैयारी की है दरअसल वही आपके परिणाम को निर्धारित करता है। वास्तव में आपकी असल परीक्षा उस दिन नहीं होती जिस दिन आप परीक्षा भवन में बैठकर परीक्षा दे रहे होते हैं, आपकी वास्तविक परीक्षा तो हर उस बीत रहे दिनों में हो रही होती है जब आप उस परीक्षा की तैयारी कर रहे होते हैं।आपकी तैयारी में बीत रहा प्रत्येक दिन परीक्षा का दिन है, इन दिनों में आप किस तरह खुद को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित किये हुए हैं वही आपके परीक्षा के दिन का परिणाम तय करेगा। अतः परीक्षा की तारीख वास्तविक परीक्षा का दिन नहीं है, वह एक सामान्य दिन है अतः उसके नजदीक आने से दवाब में होना तो निरर्थक हैI आपका आज का बीत रहा दिन ही वास्तव में परीक्षा की तारीख है, यही समय आपकी सफलता को निर्धारित कर रहा हैI

    एक और बात आपको अच्छी तरह से पता है कि आप इस देश की उन बेहतरीन प्रतिभाओं में से एक हैं तभी आप प्रतियोगिता परीक्षा में या अन्य परीक्षा में भाग लेने जा रहे हैंI आपका इस हेतु तैयारी करना और उसमें भाग लेना ही साबित करता है कि आप सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं में से एक हैं। और यही आपकी वास्तविक सफलता है। आपका अपने कैरियर के प्रति हमेशा निरंतर निष्ठावान रहना ही आपकी श्रेष्ठता का सबसे बड़ा प्रमाण हैI अतः आप तो पहले से ही विजयी हैं, जीत चुके हैं, फिर किसी एक दिन परीक्षा भवन में होने वाली परीक्षा को लेकर आशंकित, आतंकित होना तो व्यर्थ ही है।

    मनुष्य का जीवन स्वयं में अनंत सम्भावनाओं का भंडार है। हर मनुष्य के अंदर इतनी सारी सम्भावनाएं छुपी हैं की इसका आकलन कोई नहीं कर सकताI और इन तमाम सम्भावनाओं के अनंत द्वार के बाहर खड़े हो कर सिर्फ किसी एक द्वार में प्रवेश कर पाने  की सफलता या असफलता आपके सम्पूर्ण जीवन का अंतिम निष्कर्ष नहीं हो सकताI याद रखिये, जन्म एवं मृत्यु के बीच कोई भी एक या अनेक घटना आपके जीवन का अंतिम सत्य नहीं हो सकता। न कोई जीत अंतिम है और न ही कोई हार आखिरी है। अंतिम सत्य जन्म है और अंतिम निष्कर्ष मृत्यु है। इसके अलावा हर छोटी या बड़ी बात चाहे उस वक्त वह आपको कितना भी महत्वपूर्ण क्यों नहीं लगता हो, वह न तो अंतिम सत्य है और न ही आखिरी निष्कर्षI अतः जब कोई भी बात अंतिम निष्कर्ष है ही नहीं तो फिर किसी एक परीक्षा का परिणाम, या एक घटना, दुर्घटना का प्रभाव आपके अनंत सम्भावनाओं वाले जीवन का अंतिम निष्कर्ष भला कैसे हो सकता है? कदापि नहीं, कभी नहींI

    दरअसल हम अपनी अज्ञानतावश अपना सर्वस्व किसी एक घटना पर निर्भर मान लेते हैं, ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं, होता ही नहीं हैI सदी के महानायक अमिताभ बच्चन कोलकता में आठ साल तक अनेकानेक नौकरी करते रहेI 1962 में हावड़ा स्टेशन पर नौकरी की तलाश में उतरने के पश्चात् पेपर मिल व कोल माइन्स वाली बर्ड एंड कम्पनी में पहली नौकरी की शुरुआत कर के अगले आठ साल तक उन्होंने कई नौकरी कीI  पर न तो कोई कम्पनी उन्हें स्थायी रूप से अपना पाई और न ही ये किसी कम्पनी को स्थायी रूप से स्वीकार पाए। इन्ही अमिताभ बच्चन के अति आकर्षक प्रभावी व्यक्तित्व को कभी निर्माता निर्देशकों ने सिनेमा हेतु उपयुक्त ही नहीं माना थाI अब आप जरा सोचिये यदि अमिताभ बच्चन कोलकोता के आठ साल तक की अवधि के अपनी नौकरी की असफलता को आखिरी मान लेते या निर्माताओं के इंकार को अंतिम निष्कर्ष मानकर खुद को असफल मानते हुए स्थायी रूप से निराश हो जाते तो क्या वे आज वाले द ग्रेट अमिताभ बच्चन होते, नहीं नI महेंद्र सिंह धोनी की कहानी फिल्म के द्वारा सभी तक पहुँच ही चुकी है। अपने रेलवे की नौकरी, वहाँ की परेशानियों को उन्होंने अपने जीवन का अंतिम निष्कर्ष मान लिया होता तो क्या वे वह हो पाते जो वे आज हैं, नहीं नI

    मैं अपनी बात बताता हूँ आपको, मेरे पापा चाहते थे कि मैं एक डॉक्टर बनूं, बारहवीं तक मैंने मैथ को नजरंदाज करते हुए बायोलॉजी को प्राथमिकता दी और उसी हेतु तैयारी करता रहा, पर बारहवीं पूरी होते-होते मैं यह समझ गया कि मैं डॉक्टर बनने के लिए ली जाने वाली प्रवेश परीक्षा में सफल होने लायक योग्यता नहीं रखताI और जब यह बात मैं अच्छी तरह समझ गया तो फिर मैंने स्पष्ट शब्दों में पापा से इस सम्बन्ध में बात की, उनका रुख साकारात्मक था और मैं बिल्कुल भिन्न पेशे में आ गयाI और तब से अब तक जो भी किया, जो भी कर रहा हूँ उससे संतुष्ट हूँI अब मुझे लगता है यदि तब मैं डॉक्टर बन जाता तो शायद वह सब नहीं कर पाता जो मैं न बनने पर कर पाया हूँ और कर रहा हूँI तब मेरी दो साल की तैयारी व्यर्थ नहीं गई, मैंने उसे कभी भी व्यर्थ नहीं मानाI मैं तो ऐसा समझता हूँ कि यदि मैं डॉक्टर बनने का प्रयास अगले कुछ और सालों तक करता रहता तो मेरे जीवन का काफी सारा वक्त नष्ट होता, इस हिसाब से मात्र दो साल ही लगने की स्थिति में मैं तो लाभ में ही हूँI

    अतः जीवन में किसी एक लक्ष्य से सम्बन्धित असफलता को अपने सम्पूर्ण जीवन का निष्कर्ष मान लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहींI किसी एक घटना, एक परीक्षा को पूरा जीवन कभी न समझें, वह उस वक्त आपको चाहे जितना भी बड़ा क्यों न लगता हो, उस वक्त चाहे वह कितना भी प्रभावी क्यों न महसूस होता हो, वास्तव में पुरे जीवन की दृष्टि से वह एक क्षणिक अंश मात्र ही होता हैI आपका जीवन उससे हजारों गुणा ज्यादा विशाल, ज्यादा महत्वपूर्ण है। एक दिन, एक साल या दस साल आपके जीवन का अंतिम निष्कर्ष नहीं हो सकताI इसके पश्चात भी आप स्वयं में अनंत सम्भावनाओं के स्वामी हैं, आपके पास अभी भी असंख्य बड़े मौके मौजूद हैं, एक बहुत बड़े संभावनाओं का आकाश अभी भी बेसब्री से आपका ही इंतजार कर रहा है अतः उस तरफ देखिये और आगे बढ़ते रहिये। जब कोई एक घटना, कोई एक परिस्थिति आखिरी है ही नहीं फिर किसी एक परीक्षा को लेकर इस हद तक संवेदनशील होना कि वह हर वक्त दिलोदिमाग पर हावी हो कर अनावश्यक दवाब बनाता रहे, और आपकी क्षमता पर नाकारात्मक प्रभाव डालता रहे, अनुचित है।

    आप अभी चाहे जिस भी परीक्षा की तैयारी कर रहे हों वह आपके कैरियर से सम्बन्धित आपके निरंतर संघर्ष का एक बहुत ही छोटा सा अंश है, अतः उसके निरर्थक दवाब से प्रभावित हुए बगैर अपनी क्षमता का पूर्ण प्रयोग करिये और परिणाम भविष्य पर छोड़ दीजिये। न तो अपेक्षित परिणाम का आना आपकी अंतिम जीत है और न ही अनपेक्षित परिणाम का आना आपका आखिरी निष्कर्ष हैI परिणाम चाहे जैसा भी हो, सफलता या असफलता, वह आपके अनंत सम्भावनाओं वाले विशाल जीवन का एक छोटा सा बिंदु मात्र हैI जीवन गाथा, आपका संघर्ष, आपकी निष्ठा तो उसके पश्चात भी जारी रहनी चाहिए, इसी में आपके जीवन की वास्तविक सार्थकता है, सफलता है और इसी में सच्ची ख़ुशी हैI

    हमारे ऊपर दवाब का, हमारे तनाव का एक महत्वपूर्ण कारण सम्भावित असफलता के प्रति हमारा भय भी हैI स्वभाविक रूप से हम असफल होना नहीं चाहते, और इसीलिए असफलता से डरते हैंI यदि अच्छे नम्बर नहीं आये तो, यदि अच्छा रैंक नहीं आया तो, यदि मेरे मित्र का चयन हो गया और मेरा नहीं हुआ तो, इस तरह के अनेकानेक गैर जरूरी आशंका हमारी क्षमता को प्रभावित कर दरअसल हमारे परिणाम पर ही नाकारात्मक असर डालती हैI आपने अभी परीक्षा दी नहीं तो फिर उस परीक्षा में कितने नम्बर आयेंगे उसके बारे में अभी सोचकर वक्त बर्बाद करने का क्या मतलब? कितने नम्बर और क्या रैंक आएगा यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि इस बीत रहे समय का सदुपयोग आप कितनी गम्भीरता और निरन्तरता के साथ कर रहे हैंI यदि आज आप अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण इमानदार हैं तो फिर आने वाले कल के गर्भ में छुपे प्रश्नों को लेकर अभी का अपना महत्वपूर्ण समय और उर्जा क्यों नष्ट कर रहे हैं, यह तो नासमझी हैI एक बात सदैव याद रखें, हमारे भविष्य पर हमारा पूर्ण नियंत्रण नहीं है और यदि हम उसे एक हद तक नियंत्रित करना भी चाहते हैं तो वह सिर्फ इस बीत रहे आज पर निर्भर करता हैI आने वाला कल महत्वपूर्ण नहीं है, प्रभावी नहीं है, अपितु यह आज महत्वपूर्ण, प्रभावी है, इसीलिए इस आज का सदुपयोग करिये निश्चिन्त हो करI

    कई बार कुछ छात्र इस बात के लिये भी चिंतित हो जाते हैं कि यदि उसके किसी मित्र का या उसके किसी भी परिचित का चयन हो गया और स्वयं उसका नहीं हो पाया तो लोग क्या कहेंगे, घरवाले क्या कहेंगेI यह एकदम गैरजरूरी सोच हैI किसी भी व्यक्ति की सफलता या असफलता आपके अपनी असफलता या सफलता से, आपके जीवन से न तो सम्बन्धित है और न ही प्रभावी हैI किसी व्यक्ति विशेष की सफलता या असफलता उसका व्यक्तिगत प्रश्न है, यह दूसरे के लिये चिंतित होने का विषय है ही नहींI फिल्म एक्टर सुशांत सिंह राजपूत हमारे ही शहर पटना के निवासी हैं, उन्होंने दसवीं तक की पढाई यहीं के एक स्कुल से की हैI पिछले दिनों उनके क्लास के एक सहपाठी से अनायास ही मुलाकात हो गई, बातचीत के क्रम में उन्होंने गर्व से बताया कि एक्टर सुशांत सिंह राजपूत उनका सहपाठी रह चूका हैI मैंने जब उनसे उनके अपने कैरियर के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के पश्चात अभी वह एक मल्टीनेशनल कम्पनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैंI जहाँ तक मुझे पता है सुशांत सिंह राजपूत ने दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में पढ़ाई की हैI अब जरा समय के उस खंड के बारे में कल्पना करिये जब सुशांत सिंह राजपूत का चयन आईआईटी कॉलेज में नहीं हो पाया  और उनके इस मित्र का चयन हो गया थाI यदि इस बात से सुशांत सिंह राजपूत दुखी हो कर निराश हो जाते तो क्या आज वह अपने उसी आईआईटीयन मित्र के लिये गर्व का विषय बन पाते, नहीं नI आईआईटी में एडमिशन न हो पाना सुशांत सिंह राजपूत के जीवन के सिर्फ उस खंड की असफलता थी, उनके जीवन का वह अंतिम निष्कर्ष, आखिरी असफलता तो कतई नहीं थाI अतः अपने जीवन की किसी भी असफलता को किसी अन्य व्यक्ति की सफलता के परिपेक्ष्य में देख कर दुखी होने या ऐसी किसी सम्भावना के बारे में पूर्व से ही सोचकर खुद पर अनावश्यक दवाब लेना अव्यवहारिक है, नुकसानदेह हैI

      एक बात सदैव ध्यान में रखें, कैरियर से सम्बन्धित किसी परीक्षा की सफलता या असफलता और एक व्यक्तित्व के रूप में आपकी सफलता और असफलता दोनों बिल्कुल ही भिन्न विषय है, दोनों का आपस में कतई कोई सम्बन्ध नहीं हैI किसी उच्चस्तरीय परीक्षा में सफलता का अर्थ व्यक्ति के रूप में आपकी सफलता कतई नहीं हैI मानव जीवन में एक व्यक्तित्व के रूप में आपकी सफलता का निर्धारण आपके निजी गुणों, आंतरिक मानसिक मजबूती, साहस, क्षमता, कठिन परिस्थितियों में आपके संयमित व्यवहार व निष्कलंकित आचरण के आधार पर होता हैI जीवन की असली परीक्षा यह है और यह विडम्बना ही है कि हम जीवन के इस वास्तविक परीक्षा के प्रति सबसे ज्यादा उदासीन रहते हैंI ध्यान रखें आपका पद अन्य व्यक्ति के मन में भय पैदा करा सकता है, सम्मान नहीं दिलवा सकताI आपको सम्मान आपके वैयक्तिक गुणों के आधार पर ही मिलेगाI इसके साथ ही आने वाले जीवन की तमाम कठिनाइयों, विपरीत परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना भी आप अपने इन्ही वैयक्तिक गुणों के आधार पर कर पाएंगे, उस वक्त कैरियर सम्बन्धित सफलता से ज्यादा आपकी व्यक्तित्व आधारित सफलता महत्वपूर्ण हो जाती हैI कैरियर की सफलता जरूरी है पर वह सबकुछ नहीं है, पूरा जीवन उसी में निहित नहीं है, सिर्फ वही जीवन नहीं है बल्कि वह जीवन का एक भाग मात्र हैI ना ही उससे सम्बन्धित असफलता ही आखिरी है या ना ही वह आपके जीवन का अंतिम निष्कर्ष हैI अतः उसे लेकर किसी अनावश्यक दवाब को खुद के उपर हावी न होने देंI

    आपको आपके उज्ज्वल भविष्य एवं सफल, सन्तुष्ट जीवन हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनायेंI

Comments (1)

  1. Prashant
    August 26, 2017 - 11:07 pm Reply

    Nice thought

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